जब गमों ने कोई पर्दा नहीं किया 
तो आँसुओं को दो हिस्सों में क्यों कर दिया
एक का हक़ दूसरे की कमजोरी
औरत  की आँखों से निकले तो हमदर्दी पा गए
मर्द की आँखों से निकले  तो उसी की कमजोरी कहला गए


जज्बातों का तो हफा खुदा ने सबको दिया है
बस फर्क सिर्फ इतना है की उनके इज़हार का हक़
इस ज़ालिम समाज ने सिर्फ औरतों को दिया है
आखिर क्यों , मर्द को दर्द नहीं होता क्या
या  यूं कहें, कि  उन्हें दिखाने का हक़ ही नहीं
जज्बात जता देने से मर्दांगी कम नहीं होती
थोड़ा खुल कर रो लेने से किसी की कमजोरी साबित नहीं होती

जब गमों ने कोई पर्दा नहीं किया
तो आंसुओं को दो हिस्सों में  क्यों कर दिया
एक के आंसू छलके तो दुनिया पूछ्ने लगी
दूसरे ने आह क्या भरी वो उसकी लाचरगी का सबूत हो गयी
औरत की आँखों से निकले तो मान्य होते हैं
वही अगर मर्द की आँखों से निकले तोह जायज़ भी नहीं लगते

आखिर क्यों ?
मर्द इंसान नहीं होते क्या ?
जब गमों ने पर्दा नहीं किया
तो हमने क्यों फर्क किया