Posts

Showing posts from May, 2019
जब गमों ने कोई पर्दा नहीं किया  तो आँसुओं को दो हिस्सों में क्यों कर दिया एक का हक़ दूसरे की कमजोरी औरत  की आँखों से निकले तो हमदर्दी पा गए मर्द की आँखों से निकले  तो उसी की कमजोरी कहला गए जज्बातों का तो हफा खुदा ने सबको दिया है बस फर्क सिर्फ इतना है की उनके इज़हार का हक़ इस ज़ालिम समाज ने सिर्फ औरतों को दिया है आखिर क्यों , मर्द को दर्द नहीं होता क्या या  यूं कहें, कि  उन्हें दिखाने का हक़ ही नहीं जज्बात जता देने से मर्दांगी कम नहीं होती थोड़ा खुल कर रो लेने से किसी की कमजोरी साबित नहीं होती जब गमों ने कोई पर्दा नहीं किया तो आंसुओं को दो हिस्सों में  क्यों कर दिया एक के आंसू छलके तो दुनिया पूछ्ने लगी दूसरे ने आह क्या भरी वो उसकी लाचरगी का सबूत हो गयी औरत की आँखों से निकले तो मान्य होते हैं वही अगर मर्द की आँखों से निकले तोह जायज़ भी नहीं लगते आखिर क्यों ? मर्द इंसान नहीं होते क्या ? जब गमों ने पर्दा नहीं किया तो हमने क्यों फर्क किया